Friday, 26 June 2015

गोल-लोल-कपोलन की छबि 
निहरत ही हिय हरसत है 
या ऋतु बरखा की ऐसी मतवारी 
अंग - अंग बिजुरिया तड्पत है 
हुलस - हुलस जाए जिया पिया का 
जबही साजन सजनी को निरखत है
सोचे हल पल आई मिलन की बेला अब
जाने क्यों वाम अंग फरकत है
हाय निहारू आज पिया को
या मैं लाज का घूँघट काढू
सरक - सरक सर से -
मोरी चुनरिया सरकत है
या जग मुझको कहे बावरी
मैं विरहन हूँ प्रीत की मारी
उलझ उलझ इन बतियन में
नित नयनन से जल बरसत है ...... ॥ अंजलि पंडित ।





खण्ड-खण्ड कर दूँ मैं
राह की शिला प्रखण्ड
रुख आंधियों का भी
मैं मोड दूँ
आन-बान-शान के 
आए जो सामने
उन मुश्किलों की
बांह मैं मरोड़ दूँ
लांघ जाऊँगी मैं
दरिया भी आग का
मुझे चाह है मंजिल की
मैं हर लक्ष्य भेद दूँ
रुकूँ नहीं , थमू नहीं
किसी बयार से
ये मुमकिन नहीं
मैं डरकर -
आगे बढ़ना छोड़ दूँ ..... ॥ अंजलि पंडित ॥

Wednesday, 24 June 2015

कभी प्रीत राग गाऊँ
कभी खुद से लजाऊँ
कैसे इस बेकल जिया को समझाऊँ ,
हाय ! कैसी चली ये बयार
मन मोरा चकोर हुआ जाए रे .....
कभी सोचूँ मैं सबसे बताऊँ
कभी सोचूँ मैं सबसे छुपाऊँ
जाने मन में ये कैसी उमंग कैसी तरंग है
न जानू ये कोई जोग है
या प्रेम रंग है .......
ये उलझन जिया की कैसे सुलझाऊँ रे .... अंजलि पंडित ।